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Lingaraj Temple History: क्यों और कैसे बना भुवनेश्वर का सबसे प्राचीन मंदिर? जानिए 1000 साल पुराना इतिहास और 'हरिहर' का रहस्य

Narayan Behera
WRITTEN BYNarayan Behera
PUBLISHED ONOctober 19, 2026
READ TIME6 min read
Lingaraj Temple History: क्यों और कैसे बना भुवनेश्वर का सबसे प्राचीन मंदिर? जानिए 1000 साल पुराना इतिहास और 'हरिहर' का रहस्य
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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर को 'मंदिरों का शहर' (City of Temples) कहा जाता है, और इस मुकुट का सबसे चमकदार हीरा है — 11वीं शताब्दी का भव्य श्री लिंगराज मंदिर (Lingaraj Temple)। 180 फीट ऊंचे शिखर वाला यह विशाल पावन धाम न केवल कलिंग वास्तुकला की पराकाष्ठा है, बल्कि सनातन परंपरा के दो सबसे बड़े संप्रदायों — शैव (भगवान शिव) और वैष्णव (भगवान विष्णु) के अद्वितीय मिलन 'हरिहर' (Harihara) का जीवंत प्रमाण है। आइए जानते हैं 'How & Why' के इस ऐतिहासिक सफर में कि लिंगराज मंदिर क्यों (Why) और कैसे (How) बना, और इसके 1000 साल पुराने रहस्य क्या हैं।

📍 श्री लिंगराज मंदिर: संक्षिप्त परिचय (Quick Snapshot)

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स्थान एक आम्र क्षेत्र (पुराना भुवनेश्वर), ओडिशा
निर्माण काल 11वीं शताब्दी (लगभग 1090-1104 ईस्वी)
प्रमुख निर्माता राजा सोमवंशी शासक ययाति प्रथम (Jajati Keshari) एवं ललाटेंदु केशरी
विशिष्ट स्वरूप हरिहर (आधा शिव 'हर' + आधा विष्णु 'हरि')
शिखर की ऊंचाई 180 फीट (55 मीटर) — भुवनेश्वर का सबसे ऊंचा मंदिर
पवित्र जलाशय बिंदुसागर झील (Bindusagar Lake)

1. WHY: लिंगराज मंदिर का निर्माण क्यों हुआ था? (धार्मिक व ऐतिहासिक कारण)

लिंगराज मंदिर के निर्माण के पीछे दो मुख्य कारण हैं — एक पौराणिक और दूसरा ऐतिहासिक व सामाजिक:

क) पौराणिक कारण — 'एकाम्र क्षेत्र' और माता पार्वती की विजय:

ब्रह्म पुराण और एकाम्र पुराण के अनुसार, भुवनेश्वर का प्राचीन नाम 'एकाम्र क्षेत्र' (Ekamra Kshetra) था, क्योंकि यहाँ एक विशाल आम्र (आम) का वृक्ष था जिसके नीचे भगवान शिव ने गुप्त रूप से तपस्या की थी।

कथा के अनुसार, यहाँ दो शक्तिशाली असुर भाई 'कीर्ति' और 'वास' निवास करते थे, जिन्होंने तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था। माता पार्वती ने एक रूपवती गोपालिका का रूप धारण किया। जब दोनों असुरों ने उन पर कुदृष्टि डाली, तब देवी ने अपने दोनों पैरों के अंगूठे से दोनों राक्षसों को कुचलकर उनका संहार किया। इसके बाद भगवान शिव यहाँ 'कृत्तिवास' (लिंगराज) के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए।

ख) सामाजिक व ऐतिहासिक कारण — शैव और वैष्णव मतों का महा-समन्वय (हरिहर):

11वीं शताब्दी में ओडिशा में एक बड़ा वैचारिक संघर्ष चल रहा था — एक तरफ भगवान शिव के उपासक (शैव) थे और दूसरी तरफ भगवान जगन्नाथ/विष्णु के उपासक (वैष्णव)।

सोमवंशी राजाओं ने दोनों संप्रदायों के बीच सौहार्द स्थापित करने के लिए मंदिर को केवल शिव का नहीं, बल्कि 'हरि' (विष्णु) और 'हर' (शिव) का संयुक्त धाम बनाया:

  • यहाँ गर्भगृह में स्थापित विशाल प्राकृतिक स्वयंभू लिंग पर बिल्वपत्र (बेलपत्र - शिव का प्रिय) और तुलसीपत्र (विष्णु का प्रिय) दोनों एक साथ चढ़ाए जाते हैं।
  • मंदिर के 180 फीट ऊंचे शिखर पर केवल त्रिशूल नहीं है, बल्कि भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और भगवान शिव का पिनाक/त्रिशूल दोनों संयुक्त रूप से सुशोभित हैं।
श्री लिंगराज मंदिर का मुख्य नक्काशीदार प्रवेश द्वार और परकोटा
श्री लिंगराज मंदिर का प्राचीन प्रवेश द्वार: कलिंग स्थापत्य कला के बेजोड़ सिंह और द्वारपालों की नक्काशी

2. HOW: लिंगराज मंदिर का निर्माण कैसे हुआ? (स्थापत्य व इंजीनियरिंग)

लिंगराज मंदिर को कलिंग मंदिर स्थापत्य (Kalinga Architecture) की सबसे परिपक्व और भव्य रचना माना जाता है। इतिहासकार जेम्स फर्ग्यूसन ने लिखा था कि "यह भारत के शुद्धतम और सबसे प्रभावशाली हिंदू मंदिरों में से एक है।"

चार प्रमुख संरचनात्मक खंड (Four Architectural Modules):

  1. विमान या देउल (Vimana / Deula): मुख्य गर्भगृह जहां स्वयंभू शिवलिंग स्थित है। यह 180 फीट ऊंचा वक्ररेखीय शिखर (Rekha Deula) है, जो बिना किसी लोहे या सीमेंट के, केवल बलुआ पत्थर (Sandstone) के विशाल ब्लॉकों को इंटरलॉकिंग विधि से संतुलित करके बनाया गया है।
  2. जगमोहन (Jagamohana): यह पिरामिड के आकार की छत वाला प्रार्थना कक्ष (Pidha Deula) है, जहां भक्त एकत्रित होकर ध्यान लगाते हैं।
  3. नाटमंदिर (Natamandira): यह 12वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजाओं द्वारा जोड़ा गया उत्सव और नृत्य मंडप है, जहां देवदासियां महाप्रभु के समक्ष नृत्य प्रस्तुत करती थीं।
  4. भोगमंडप (Bhoga Mandapa): भोजन व महाप्रसाद अर्पित करने के लिए बना चौथा विशाल मंडप, जिसकी दीवारों पर देवी-देवताओं, संगीतकारों और पशु-पक्षियों की जीवंत नक्काशी उकेरी गई है।

विशाल चहारदीवारी (Laterite Wall) के भीतर मुख्य मंदिर के चारों ओर 108 छोटे-बड़े सहायक मंदिर स्थापित हैं, जो पूरे परिसर को एक दिव्य आध्यात्मिक नगर का रूप देते हैं।

पवित्र बिंदुसागर झील और पृष्ठभूमि में रोशनी से जगमगाता लिंगराज मंदिर
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर पवित्र बिंदुसागर सरोवर और रोशनी से जगमगाता ऐतिहासिक लिंगराज मंदिर

3. पवित्र बिंदुसागर झील: जहाँ समाई हैं भारत की सभी नदियां

मंदिर के ठीक उत्तर दिशा में 1300 फीट लंबा और 700 फीट चौड़ा एक विशाल पवित्र सरोवर स्थित है, जिसे बिंदुसागर (Bindusagar Lake) कहा जाता है।

  • पौराणिक मान्यता है कि जब माता पार्वती को असुर वध के बाद प्यास लगी, तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से धरती को भेदकर भारत की सभी पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, कावेरी) और सरोवरों से एक-एक 'बिंदु' (बूंद) जल लाकर इस तालाब का निर्माण किया था।
  • आज भी लिंगराज मंदिर में होने वाले सभी मुख्य धार्मिक अनुष्ठानों और स्नान के लिए इसी बिंदुसागर का पावन जल उपयोग किया जाता है।

4. महाशिवरात्रि का 'महादीप' और अशोकष्टमी रथयात्रा

लिंगराज मंदिर की दो परंपराएं पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं:

  • महाशिवरात्रि का महादीप (Mahadipa Tradition): महाशिवरात्रि की पावन रात्रि को मंदिर के प्रशिक्षित सेवायत बिना किसी सीढ़ी या रस्सी के 180 फीट ऊंचे शिखर पर उल्टे चढ़ते हैं और आधी रात को विशाल 'महादीप' प्रज्वलित करते हैं। इस दीपक के दर्शन के बाद ही मंदिर परिसर में मौजूद लाखों श्रद्धालु अपना निर्जला उपवास खोलते हैं।
  • रुक्मिणी रथयात्रा (अशोकष्टमी):** चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भगवान लिंगराज का चल-प्रतिमा विग्रह एक विशाल रथ (रुक्मिणी रथ) पर सवार होकर रामेश्वर मंदिर की यात्रा पर निकलता है, जिसे देखने हजारों श्रद्धालु जुटते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. लिंगराज मंदिर का निर्माण कब और किसने करवाया था?

लिंगराज मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजवंश के राजा ययाति प्रथम (Jajati Keshari) ने शुरू करवाया था और उनके उत्तराधिकारी राजा ललाटेंदु केशरी ने इसे पूर्ण कराया। बाद में 12वीं सदी में गंगा वंश के शासकों ने नाटमंदिर और भोगमंडप का विस्तार किया।

Q2. लिंगराज मंदिर में शिवलिंग का क्या रहस्य है?

यहाँ स्थित शिवलिंग मानव निर्मित नहीं बल्कि स्वयंभू (प्राकृतिक रूप से प्रकट) है, जिसे 'हरिहर' कहा जाता है। इस शिवलिंग पर शिव के प्रिय बेलपत्र और भगवान विष्णु की प्रिय तुलसी दोनों एक साथ अर्पित किए जाते हैं।

Q3. लिंगराज मंदिर के शिखर की ऊंचाई कितनी है?

मंदिर के मुख्य शिखर (विमान) की ऊंचाई लगभग 180 फीट (55 मीटर) है, जो ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर का सबसे ऊंचा मंदिर है।

Q4. क्या गैर-हिंदू मंदिर के भीतर प्रवेश कर सकते हैं?

सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार केवल सनातन धर्म के अनुयायी ही मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश कर सकते हैं। विदेशी पर्यटकों और अन्य श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की उत्तरी दीवार के बाहर लॉर्ड कर्जन द्वारा एक ऊंचा चबूतरा (Viewing Platform) बनाया गया है, जहाँ से मंदिर का स्पष्ट दर्शन किया जा सकता है।

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